Lutyens’ Delhi Bungalows: लुटियंस दिल्ली के दो ऐतिहासिक पते, 5 भगवान दास रोड स्थित ‘टिहरी गढ़वाल हाउस’ और मोतीलाल नेहरू मार्ग का वह बंगला जहां कभी पंडित नेहरू रहे थे, इन दिनों अपनी संभावित बिक्री को लेकर चर्चा में हैं. लगभग 1000 करोड़ और 1100 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाली ये संपत्तियां विरासत और सत्ता के गौरवशाली इतिहास की गवाह रही हैं. खबरों के अनुसार, एक प्रमुख फूड एंड बेवरेज कारोबारी इन ऐतिहासिक इमारतों को खरीदने की तैयारी में है.

नई दिल्ली की चौड़ी, पेड़ों से घिरी सड़कों पर चलते हुए अक्सर लगता है कि यहां समय ठहर-सा गया है. लुटियंस दिल्ली के ये बंगले सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं, बल्कि सत्ता, विरासत और इतिहास की जीवित दास्तान हैं. लेकिन अब इन दास्तानों पर बाजार की नजर है. राजधानी के दो प्रतिष्ठित पते—5 भगवान दास रोड का टिहरी गढ़वाल हाउस और मोतीलाल नेहरू मार्ग का वह बंगला, जहां कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू रहे—आज बिक्री की खबरों के कारण चर्चा में हैं.
टिहरी गढ़वाल हाउस: देवभूमि की स्मृतियों का पता
अगर आप फिरोजशाह रोड से पैदल भगवान दास रोड की ओर बढ़ें, तो सड़क के दाहिने कोने पर एक भव्य औपनिवेशिक शैली का बंगला आपका ध्यान खींचता है. उसके बाहर लिखा है—टिहरी गढ़वाल हाउस. पता है: 5, भगवान दास रोड.
करीब सवा तीन एकड़ में फैला यह शानदार बंगला कभी टिहरी गढ़वाल रियासत के महाराजा का दिल्ली स्थित निवास रहा है. देवभूमि उत्तराखंड से दिल्ली आ बसी कई पीढ़ियों के लिए यह सिर्फ एक भवन नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का केंद्र रहा है. यहां प्रवासी उत्तराखंडियों की बैठकों की रौनक रहती थी.
अब यही ऐतिहासिक संपत्ति बाजार में है. खबरों के मुताबिक इसकी अनुमानित कीमत लगभग एक हजार करोड़ रुपये आंकी जा रही है. बताया जाता है कि राजधानी का एक प्रमुख कारोबारी, जिसकी फूड और बेवरेज सेक्टर में मजबूत पकड़ है, इसे खरीदने का इच्छुक है. दिलचस्प यह कि वही कारोबारी पंडित नेहरू के पहले दिल्ली आवास को भी बड़ी राशि में खरीद रहा है.
राजपरिवार और विरासत
टिहरी गढ़वाल हाउस के मौजूदा मालिक महाराजा मनुजेंद्र शाह हैं. उनके पिता राजा मानवेन्द्र शाह यहां दशकों तक रहे. वे आठ बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे और दिल्ली में रहते हुए भी अपने क्षेत्र और समुदाय से जुड़े रहे. 2007 में उनके निधन के बाद यहां होने वाली सामाजिक-राजनीतिक बैठकें लगभग थम गईं.

गढ़वाल हाउस (फाइल फोटो)
यह भवन 1940 के दशक में बना था, जब ब्रिटिश सरकार ने देश की 29 रियासतों को लुटियंस दिल्ली या सिविल लाइंस में आवास बनाने के लिए जमीन आवंटित की थी. आजादी के बाद 1949 में टिहरी गढ़वाल रियासत का भारत में विलय हुआ, लेकिन यह संपत्ति राजपरिवार के निजी स्वामित्व में बनी रही.
लोकेशन जो इतिहास और शक्ति के बीच है
भगवान दास रोड की लोकेशन असाधारण है. मंडी हाउस—दिल्ली का सांस्कृतिक केंद्र—पास ही है. सुप्रीम कोर्ट कुछ सौ मीटर दूर है. इंडिया गेट, भारत मंडपम, आईटीओ और कनॉट प्लेस नजदीक हैं. यह वह इलाका है जहां राजनीति, न्यायपालिका, संस्कृति और व्यापार एक-दूसरे से टकराते भी हैं और मिलते भी.
रियल एस्टेट विशेषज्ञ और Bhoomann Developers Pvt. Ltd के मैनेजिंग डायरेक्ट निखिल जैन मानना है कि टिहरी गढ़वाल हाउस का यह सौदा सिर्फ आर्थिक नहीं, प्रतीकात्मक भी है. आजादी के बाद कई राजपरिवारों ने अपनी संपत्तियां बेचीं या उन्हें होटल और रिसॉर्ट में बदला. टिहरी गढ़वाल हाउस की संभावित बिक्री उसी बदलाव की अगली कड़ी है—जहां विरासत और वाणिज्य का संगम हो रहा है.
नेहरू का पहला ठिकाना: जहां इतिहास ने करवट ली
अब रुख करते हैं मोतीलाल नेहरू मार्ग की ओर, जिसे कभी यॉर्क रोड कहा जाता था. आज यहां गाड़ियों की रफ्तार है, सुरक्षा का घेरा है और सत्ता का सन्नाटा. पर 1947 की एक ऐतिहासिक रात इस पते ने कुछ और ही देखा था.
14 अगस्त 1947 की रात, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तब कुछ साधु उनके आवास पर आशीर्वाद देने पहुंचे. लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर ने अपनी पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट में उल्लेख किया है कि नेहरू धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति नहीं थे, फिर भी उन्होंने साधुओं का स्वागत किया और तिलक लगवाया.
1946 में अंतरिम सरकार के मुखिया बनने के बाद नेहरू इसी बंगले में रहने आए थे. यह उनका राजधानी में पहला आधिकारिक ठिकाना माना जाता है, जहां से उन्होंने स्वतंत्र भारत की रूपरेखा गढ़ने वाली अनेक वार्ताएं कीं.
सौदे की सुर्खियां
खबरों के अनुसार, इस बंगले का स्वामित्व राज कुमारी कक्कड़ और बीना कक्कड़ के पास है. करीब पौने चार एकड़ में फैली यह संपत्ति पहले 1400 करोड़ रुपये में बेचने की चर्चा में थी, पर सौदा लगभग 1100 करोड़ रुपये में फाइनल होता बताया जाता है. इसका भी खरीदार वही बताया जा रहा है,जो टिहरी गढ़वाल हाउस को खरीदना चाहता है.
खैर, नेहरु अगस्त 1947 के अंत तक यहां रहे, फिर वे रॉबर्ट टॉर रसेल द्वारा डिजाइन किए गए तीन मूर्ति भवन में चले गए. इतिहासकारों के अनुसार, 17 यॉर्क रोड (वर्तमान मोतीलाल नेहरू मार्ग) में ब्रिटिश प्रतिनिधियों से आजादी को लेकर अहम बातचीत होती थी. उस दौर में वहां आने-जाने पर कड़ी पाबंदी नहीं थी.
बदलते समय की दस्तक
इन दोनों बंगलों की संभावित बिक्री दिल्ली के रियल एस्टेट बाजार में नया अध्याय जोड़ रही है. यह सिर्फ जमीन और इमारत का सौदा नहीं, बल्कि उन स्मृतियों का भी है जो सत्ता, संघर्ष और समाज से जुड़ी हैं.
लुटियंस दिल्ली के ये पते हमें याद दिलाते हैं कि इतिहास स्थिर नहीं रहता. राजसी वैभव से लोकतांत्रिक सत्ता तक और अब कॉर्पोरेट पूंजी तक—इन बंगलों ने हर दौर देखा है.
आज जब इन पर ‘फॉर सेल’ की चर्चा है, तो सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, विरासत के भविष्य का भी है. क्या ये इमारतें अपनी कहानियां बचाए रख पाएंगी, या बाजार की नई परतें उन्हें ढक देंगी?