रूस से तेल खरीद मामले पर भारत की चुप्पी के क्या हैं मायने?

बीते साल जब अमेरिका ने रूस से तेल ख़रीदने को लेकर भारत पर 25% के अतिरिक्त टैरिफ़ की घोषणा की थी, तब रूस में भारत के राजदूत विनय कुमार ने समाचार एजेंसी स्पुतनिक को दिए इंटरव्यू में अमेरिकी टैरिफ़ को ‘अनुचित, अव्यवहारिक और ग़लत’ बताया था.

उन्होंने कहा था कि ‘भारत सरकार की नीति सबसे पहले राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की है, व्यापार व्यावसायिक आधार पर होता है, और अगर सौदा सही है, तो भारतीय कंपनियां सबसे अच्छे विकल्प से तेल खरीदेंगी.’

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से भारत-रूस संबंधों पर पश्चिमी देशों का भी ख़ासा दबाव देखने को मिला है.

तेल आयात पर ये विरोध कई बार सामने आया है.

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें

बीते तीन सालों में भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस सवाल का सामना किया है कि आख़िर भारत रूस से तेल आयात करना बंद क्यों नहीं कर देता.

जवाब में जयशंकर हमेशा यही कहते सुनाई दिए कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा का निर्धारण अपने हिसाब से तय करेगा. कोई और देश या समूह उसे डिक्टेट नहीं कर सकता.

लेकिन बीते दो फ़रवरी को भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक कहे जाने वाली जिस ट्रेड डील पर हस्ताक्षर हुए हैं, उसे लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक दावा भारत के लिए असहज स्थिति पैदा करता दिख रहा है.

दरअसल, भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर पोस्ट किया, तब अपने इस पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि भारत रूस से तेल ख़रीदना बंद करने और अमेरिकी तेल की ख़रीद बढ़ाने पर राज़ी हो गया है.

ट्रंप के मुताबिक़ भारत का रूस से तेल नहीं ख़रीदना, इस डील की एक अहम शर्त है.

लेकिन भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जब इस पर सवाल किया गया तो उन्होंने कोई भी जवाब देने से इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा, ”मैंने कई बार कहा है, इस सवाल का जवाब विदेश मंत्रालय देगा.”

पीयूष गोयल के इस जवाब से केवल दो दिन पहले समाचार एजेंसी एएनआई ने विदेश मंत्री एस.जयशंकर से ट्रेड डील के ब्योरे को लेकर सवाल किया था.

तब जयशंकर ने इसके लिए पीयूष गोयल को जवाबदेह बताया था.

वहीं दूसरी तरफ़, बीते तीन फ़रवरी को समाचार एजेंसी पीटीआई ने रूसी मीडिया का हवाला देते हुए रूसी सरकार के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव का एक बयान प्रकाशित किया था.

अपने इस बयान में पेस्कोव ने कहा था कि भारत ने रूस से तेल ख़रीद बंद करने को लेकर कोई भी संवाद नहीं किया है.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि रूस से तेल ख़रीद मामले पर भारत की चुप्पी या असमंजस की स्थिति के क्या मायने हैं?

इसके पीछे का कारण समझने के लिए बीबीसी हिन्दी ने जेएनयू में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ राजन कुमार से बात की

डॉ राजन कुमार ने बताया, “अगर भारत इस तथ्य को स्वीकार कर लेता है कि उसने रूस से तेल नहीं ख़रीदने की शर्त पर अमेरिका के साथ ट्रेड डील की है, तो यह संदेश जाएगा कि भारत अमेरिका के दबाव में आ गया. विरोधी कहेंगे कि भारत सरकार अमेरिका के सामने झुक गई.

वह कहते हैं, ”आपने देखा होगा कि विदेश मंत्रालय इस मामले में बहुत नपा-तुला जवाब दे रहा है. वह केवल इतना कह रहे हैं कि हम अपने तेल इंपोर्ट को डायवर्सिफ़ाई कर रहे हैं. ये नहीं कह रहे कि डायवर्सिफ़ाई करने का मतलब रूस से तेल खरीद बंद कर के अमेरिका, वेनेज़ुएला जैसे देशों से तेल खरीदना है. सच्चाई भी यही है कि भारत रूस के साथ तेल ख़रीद को कम करने की दिशा में काम कर रहा है और ये अमेरिका के दबाव में किया जा रहा है.”

इस पूरे मामले पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों, विशेषज्ञों और पूर्व राजदूतों ने भी टिप्पणी की है.

भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ज़ोरावर दौलत सिंह एक्स पर लिखते हैं कि भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड विवाद में अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक आज़ादी को दांव पर लगा दिया है.

उनके मुताबिक ‘चीन ज़्यादा समझदारी से काम कर रहा है, भारत को अपनी विदेश और ऊर्जा नीति पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है.’

उन्होंने बीते 6 फ़रवरी को अमेरिकी व्हाइट हाउस के एक आदेश का हवाला देते हुए लिखा, ” अब अमेरिका भारत के रूसी तेल आयात पर निगरानी रखेगा और अगर भारत अपनी ज़रूरत के हिसाब से रूसी तेल खरीदना चाहे तो अमेरिका उस पर आर्थिक दबाव डाल सकता है.”

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर
इमेज कैप्शन,रूस से तेल आयात पर किसी तरह की नीति में बदलाव के बारे में भारत ने कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है.

सामरिक मामलों के जानकार डॉ ब्रह्मा चेलानी ने भी अपनी एक पोस्ट में व्हाइट हाउस के इस एग्ज़ीक्यूटिव ऑर्डर का ज़िक्र किया है.

चेलानी लिखते हैं कि अमेरिका के वाणिज्य मंत्री को भारत के तेल आयात पर नज़र रखने के लिए कहा गया है, अगर अमेरिका को लगेगा कि भारत ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, रूस से दोबारा तेल खरीद शुरू कर दी है, तो 25% टैरिफ़ को भी दोबारा लागू किया जा सकता है.

अपनी पोस्ट में डॉ ब्रह्मा चेलानी लिखते हैं, ”यहां ‘परोक्ष ‘ शब्द ख़तरनाक है, क्योंकि इसे आधार बनाकर अमेरिका भारत के रिफ़ाइन्ड फ्यूल जैसे डीज़ल या जेट फ़्यूल पर भी ये कहते हुए पेनाल्टी लगा सकता है कि ये रूसी क्रूड से तैयार किया गया है. सस्ते रूसी यूराल्स (रूस का एक क़िस्म का कच्चा तेल) की जगह अगर बाज़ार के भाव पर अमेरिकी तेल खरीदा जाता है, जो कि ट्रांसपोर्ट खर्चों की वजह से ज़्यादा महंगा पड़ता है. इससे भारत के लिए तेल आयात का ख़र्च हर साल क़रीब चार अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. इससे साफ़ है कि अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए महंगे और भोगौलिक रूप से दूर के सप्लायर…अमेरिका पर निर्भर रहे.”

‘भारत का समझदारी भरा फ़ैसला’

भारत की एक तेल रिफ़ाइनरी.
इमेज कैप्शन,आंकड़े बताते हैं कि भारत की रिफ़ाइनरियों ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है.

जबकि अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीज जर्नल के कॉलमिस्ट सदानंद धुमे कहते हैं कि भारत सरकार को इस मामले में कमज़ोर दिखने या असमंजस में होने की ज़रूरत नहीं है.

वह कहते हैं कि सरकार को खुलकर मज़बूती के साथ स्वीकार करना चाहिए कि हां, अमेरिका के भारी टैक्स को हटवाने के लिए हमने रूसी तेल की ख़रीद को कम करने पर हामी भरी है.

वह कहते हैं, ”यह फ़ैसला समझदारी भरा है…क्योंकि भारत के पास तेल खरीदने के और भी विकल्प हैं. लेकिन अगर अमेरिका जैसे बड़े बाज़ार हम पर भारी भरकम टैरिफ़ लगाए रखते हैं, तो न निवेश आ पाता और न ही भारत निर्यात के मामले में प्रतिस्पर्धी बन पाता.”

सदानंद धुमे भारत-अमेरिका ट्रेड डील को एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि बताते हैं और कहते हैं कि सिर्फ़ लेफ़्ट विचारधारा वाले लेखकों को अच्छा महसूस कराने के लिए या उनके संतोष के लिए अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना , किसी भी ज़िम्मेदार सरकार के लिए सही नहीं हो सकता.

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के प्रमुख अजय श्रीवास्तव ने कुछ दिनों पहले बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा था कि भारत रूस से तेल ख़रीदारी लगातार कम कर रहा है.

उनके मुताबिक आधिकारिक व्यापार आंकड़ों से पता चलता है कि अक्तूबर 2025 में रूस से कुल आयात साल-दर-साल 27.7 फ़ीसदी से घट गया. ये अक्तूबर 2024 के 6.7 अरब डॉलर से गिरकर अक्तूबर 2025 में 4.8 अरब डॉलर रह गया.

व्हाइट हाउस का कार्यकारी आदेश

व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट.
इमेज कैप्शन,व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट.

बीते छह फ़रवरी को व्हाइट हाउस की तरफ़ से जारी एग्ज़ीक्यूटिव ऑर्डर के सेक्शन चार में साफ़ लिखा है कि अमेरिका के वाणिज्य मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मिलकर यह निगरानी करेंगे कि भारत कहीं सीधे या परोक्ष रूप से रूस से तेल आयात फिर से शुरू तो नहीं कर रहा है.

इस ऑर्डर के मुताबिक़, ”अगर वाणिज्य मंत्री को लगता है कि भारत ने रूस से तेल की खरीद दोबारा शुरू कर दी है, तो विदेश मंत्री अन्य अहम अधिकारियों से सलाह लेकर राष्ट्रपति को यह सुझाव देंगे कि भारत के ख़िलाफ़ आगे क्या कार्रवाई की जाए. इसमें यह भी शामिल होगा कि क्या भारत से आने वाले सामान पर दोबारा 25% अतिरिक्त आयात शुल्क यानी टैरिफ़ लगाया जाना चाहिए या नहीं.”

भारत सरकार की अब तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

लेकिन लेकिन प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं कि अप्रैल महीने तक रूसी तेल आयात को पूरी तरह ख़त्म करना भारत के लिए मुश्किल होगा.

उनके मुताबिक़, ”रूस के साथ भारत के कई कॉन्ट्रैक्ट्स हैं जिन्हें समय से पहले ख़त्म नहीं किया जा सकता. दूसरी बात की भारत की एक बड़ी पेट्रोलियम कंपनी नयारा एनर्जी रूसी कंपनी रोज़नेफ़्ट के माध्यम से तेल आयात करती है, उसका कोई दूसरे स्रोत नहीं हैं. इसलिए भारत के लिए तुरंत रूसी तेल आयात को पूरी तरह ख़त्म कर पाना संभव नहीं होगा.”

उधर विपक्षी दलों के नेता अमेरिका के इस ऑर्डर को लेकर भारत सरकार पर सख़्त हैं.

उनका कहना है कि व्यापार समझौते के नाम पर अमेरिका की तरफ़ से इस तरह की शर्तें लगाना भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के ख़िलाफ़ है. यह भारत की संप्रभुता के साथ समझौता है और इससे भविष्य में दूसरे देशों के साथ भारत के रिश्तों पर भी दबाव बढ़ सकता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Open chat
Hello 👋
Can we help you?