पतंगों के पीछे छुपा दर्द: मांझा बनाने वाले ये कारीगर किस हाल में गुज़ार रहे हैं ज़िंदगी

मांझा बनाने वाले सलीम का कहना है कि वह यह काम मजबूरी में कर रहे हैं

“हमारी हथेलियां कटती हैं, ख़ून बहता है लेकिन हमने अपने ज़िले को एक पहचान दी है.”

ये शब्द नसीम अहमद के हैं, जिनकी उंगलियों पर कई जगह कटने के निशान लगे थे लेकिन वह बेफ़िक्र होकर धागे को रंगने का काम कर रहे थे.

शाम के चार बज रहे थे और उनका मक़सद दिन का आख़िरी काम ख़ुद पूरा करके आज की मज़दूरी लेना था.

वहीं दूसरी ओर, उनका दूसरा साथी धागे को लपेटने के काम में लगा हुआ था.

उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में ऐसे दृश्य बहुत आम हैं.

अकेले बकरगंज के हुसैनबाद इलाक़े में ही लगभग एक हज़ार से अधिक कारीगर पतंगबाज़ी के लिए मांझा बनाने के काम में लगे हैं.

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बरेली में हज़ारों कारीगर मांझा बनाने का काम करते हैं

बरेली से सिर्फ़ प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और विदेशों में बड़े स्तर पर मांझा सप्लाई किया जाता है.

मकर संक्रांति के समय में इनकी मांग बढ़ जाती है. इसके अलावा ये मांग 15 अगस्त और पतंगबाज़ी के अन्य मौक़ों में भी होती है.

बरेली के व्यापारियों के अनुसार, मकर संक्रांति के दौरान गुजरात में बरेली का सबसे अधिक मांझा बिकता है.

वहीं, अगर आप गुजरात के पतंग बाज़ारों में जाएंगे, तो आपको पता चलेगा कि बरेली के मांझे के बिना गुजरात की मकर संक्राति अधूरी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 2014 में लोकसभा चुनाव के लिए बरेली में प्रचार कर रहे थे, तब उन्होंने कहा था , “गुजरात में अंतरराष्ट्रीय स्तर का पतंग महोत्सव होता है. लेकिन अगर बरेली का मांझा नहीं हुआ, तो हमारी पतंगों का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा. बरेली के मांझा के बिना गुजरात की पतंगें कहां जाएंगी?”

वैसे बरेली का मांझा न केवल गुजरात में बल्कि पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में प्रसिद्ध है. यह मांझा भारत के बाहर फ्रांस और सऊदी अरब जैसे देशों में भी बिकता है.

बरेली के मांझे की देश-दुनिया में क्यों है अलग पहचान?

मांझा कारीगर कासिम

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बरेली में मांझा बनाने की शुरुआत कैसे हुई, इसको लेकर कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है.

पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़े स्थानीय कारीगरों का कहना है कि बरेली में मांझा बनाने की शुरुआत लगभग 300 साल पहले हुई थी.

बरेली के राजकीय महिला महाविद्यालय के सहायक प्रोफे़सर डॉ. दिनेश सिंह कहते हैं, “मांझा बनाने की शुरुआत उत्तर भारत में मुग़ल काल में हुई थी. पतंग उड़ाने की कला आम लोगों तक पहुंची और लोग इसमें प्रतिस्पर्धा करने लगे. इस प्रतिस्पर्धा में मांझा की गुणवत्ता सर्वोपरि हो गई. बरेली के कारीगरों ने एक अलग तकनीक अपनाई, जिसके कारण यह मांझा मशहूर हो गया.”

बरेली में मांझा आमतौर पर गहरे काले, नीले या हरे रंग में बनाया जाता है. धागे को 60 मीटर की दूरी पर रखे लकड़ी के खंभों पर लपेटा जाता है. इसके बाद, धागे को लचीला बनाने के लिए उबले हुए चावल में पत्थर का चूर्ण, गोंद की चटनी, रूमी मस्तगी, दालचीनी, मेड्लर पाउडर और इसबगोल मिलाकर बनाया गया पेस्ट मांझा पर लगाया जाता है.

इस तरह तीन बार मांझे को घीसा जाता है, जिसके सूखने के बाद, कारीगर इसे अपने हाथों से तकली पर लपेटते हैं.

बरेली में, आमतौर पर दो कारीगर मिलकर एक दिन में 10,800 मीटर मांझा बनाते हैं.

एक कारीगर लकड़ी की छड़ी पर धागा लपेटता है और तैयार मांझा को तकली पर घुमाता है जबकि दूसरा कारीगर धागे पर लुगदी लगाता है.

लुगदी लगाने वाले कारीगर को प्रतिदिन 400 से 500 रुपये की मज़दूरी मिलती है, जबकि रस्सी लपेटने वाले को आमतौर पर 300 से 350 रुपये मिलते हैं.

बरेली में मांझा मज़दूर कल्याण समिति के अध्यक्ष अरशद हुसैन कहते हैं, “बरेली में 45 से 50 हज़ार लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मांझा बनाने के काम में शामिल हैं.”

बरेली में मांझा बनाने की प्रक्रिया श्रमसाध्य है और मांझा बनाने वाले कारीगरों की स्थिति बहुत ही दयनीय है.

कारीगर हसीन कहते हैं, “एक दिन में कम से कम 900 मीटर की 12 रीलें तैयार की जाती हैं. इसमें बहुत मेहनत लगती है. कभी-कभी धागे से हाथ कट जाते हैं और कभी-कभी हमें रोजी-रोटी कमाने के लिए कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़ता है. यह पैसा परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन हम अपने पिता और दादा-दादी के समय से यह काम करते आ रहे हैं और हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है.”

एक अन्य कारीगर, सलीम कहते हैं, “मेरी तीन बेटियां हैं. मांझा बनाने के अलावा हमारे पास कोई और हुनर ​​नहीं है. हमारे पास दूसरे काम सीखने का समय नहीं है. हम मजबूरी में यह काम कर रहे हैं.”

मांझा बनाते समय हथेलियों और उंगलियों पर कट लगना स्वाभाविक है. लेकिन ये घाव इतने गहरे होते हैं कि कई दिनों तक जख़्म बना रहता है.

जब हम कारीगर कासिम से बात कर रहे थे तो उनकी छह साल की बेटी पास ही खड़ी थी.

कासिम कहते हैं, “दाल या कढ़ी को चावल में मिलाकर हाथों से खाना मुश्किल हो जाता है. अगर मिर्च घाव में चली जाए तो आंखों में आंसू आ जाते हैं. मेरी यह बेटी मेरे हाथों पर मरहम लगाती है.”

पास खड़ी बेटी लड़खड़ाती भाषा में मरहम लगाने का तरीक़ा समझाने लगती है. पिता का सपना है कि वह अपनी बेटी को शिक्षित करेंगे और उसे डॉक्टर बनाएंगे

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