विधानसभा चुनाव बीजेपी नहीं, उसके चुनाव प्रबंधन का टेस्ट!

वैसे तो इस साल से ही सारे दलों की तरफ़ से चुनावी दाँवपेंच शुरू हो गए हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद होने वाले पाँच विधान सभाओं को जीतने में कोई कसर न रहे, लेकिन नया साल आते ही इन चुनावों का धूम धड़ाका शुरू हो जाएगा। चुनाव पहली छमाही में ही नहीं अप्रैल और मई से पहले हो जाएंगे। असम, पश्चिम बंगाल और पुदुचेरी के लिए चुनाव मार्च-अप्रैल में होंगे तो तमिलनाडु और केरल विधान सभाओं के लिए अप्रैल-मई में। और निश्चित रूप से चुनाव का ज़्यादा शोर मचाने की वजह बीजेपी का मैदान में होना और प्रमुख खिलाड़ी रहना है। क़ायदे से वह एक राज्य में शासन में है और दूसरे में काफी पिछड़कर मुख्य विपक्ष है। पर एक राज्य, पुदुचेरी में उसने जिस तरह बिना एक भी विधायक जिताए सरकार बना लिया वह उसकी राजनैतिक लड़ाई लड़ने का तरीक़ा है। और अगर अभी के चुनाव को लेकर अभी से गरमाहट आ गई है तो यह बीजेपी के चुनाव लड़ने का तरीक़ा है जो नगर पालिका चुनाव तक को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा से जोड़ देती है।

और इसे किसी दोष की तरह देखने की ज़रूरत नहीं है। आज बीजेपी का जो एकछत्र राज बना है, अन्य दलों से वह जिस तरह आगे निकली है उसमें उसके चुनाव लड़ने के तरीके, साधनों की भरभार और साल के 365 दिन की तैयारी का बड़ा हाथ है। और अन्य राज्यों के मुक़ाबले पश्चिम बंगाल में यह सबसे ज़्यादा दिखाई दे रही है क्योंकि बीजेपी इसे जीतने के लिए काफी बेचैन है। दो लोक सभा और दो विधान सभाओं में तृणमूल कांग्रेस को मुख्य टक्कर देने के बाद उसे लग रहा है कि 15 साल के ममता राज से लोगों की जो नाराजगी बढ़ी है उसका लाभ लेकर वह इस बार बंगाल का किला फतह कर सकती है।

पर उसकी मुश्किल यह है कि उसके पक्ष में 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से जो वेग बना था वह उतार पर आता दिखने लगा है। उसका वोट प्रतिशत गिरा है और तृणमूल का बढ़ा है। साथ ही उसके सांसद और विधायक भी कम चुने गए हैं। दल बदल में भी अब मौकापरस्त या किसी दबाव में उसकी तरफ आने वालों की रफ्तार कम हुई है।

बीजेपी की दिक्कत बंगाली समाज के बारे में बनी उसकी दोषपूर्ण राय और बंगाली समाज के भद्रलोक द्वारा उसके तौर तरीकों को नापसंद करने से जुड़ा है। इसके साथ ही वहां का लगभग एक चौथाई मुसलमान मतदाता भी अब पूरी तरह तृणमूल के साथ आ गए हैं। पहले कांग्रेस और वाम दलों को भी यह वोट मिलता था। बीजेपी ने एक बार हिन्दू मुसलमान ध्रुवीकरण कर तो दोबारा नामशूद्रों की गोलबंदी करके सफलता पानी चाही जो आंशिक रूप में ही सफल हुई। बंगाल में समाज सुधार आंदोलनों के चलते जाति और संप्रदाय की गोलबंदी कम है। और समाज पर प्रभावी भद्रलोक में बीजेपी की घुसपैठ नहीं है। इस बार बीजेपी ने एक युवा कायस्थ नितिन नबीन को अपना अध्यक्ष चुनकर कुछ अलग संकेत देने की कोशिश की है लेकिन इससे पहले पंचायत चुनाव में बड़ी संख्या में मुसलमान उम्मीदवार उतारने का उसका दांव पिट गया है।

असम में भी बीजेपी की परेशानी दस साल शासन करने और नागरिकता या घुसपैठ जैसे किसी मुद्दे पर ज़्यादा कुछ न कर पाने से जुड़ी है। उधर, कांग्रेस ने जब से मौलाना बदरुद्दीन वाली मुसलमानों की पार्टी से रिश्ता तोड़ा है उसे मुसलमानों का भरपूर वोट तो मिला ही है, बीजेपी के लिए उस पर हमला करना और चुनाव को हिंदु-मुसलमान बनाना मुश्किल हुआ है। राज्य में सीटों का अंतर काफी है (हालाँकि उसमें भी बीजेपी कुछ कम हुई है) लेकिन वोट प्रतिशत की लड़ाई बराबरी वाली हो गई है। और इस बार बीजेपी को ज़्यादा परेशानी अहोम सर्बानंद सोनोवाल को हटाकर पंडित हेमंत बिसवा सरमा को मुख्यमंत्री बनाने से भी जुड़ी है। 

सरमा प्रशासनिक रूप से कुशल हैं पर आसामी समाज में शासक रहे अहोम समाज को सत्ता जाने का मलाल है। असम में बहुत क़िस्म की अस्मिताएँ-पहचान काम करते हैं लेकिन नागरिकता, सीएए, पॉपुलेशन रजिस्टर, जनगणना और गहन मतदाता सर्वेक्षण जैसे किसी भी सवाल पर स्पष्ट फैसला न लेना और कोई नतीजा न देना, भाजपा को परेशान करेगा। पर जिस तरह बीजेपी चुनाव लड़ती है वैसा और कोई नहीं लड़ता यह सच्चाई भी याद रखनी होगी।

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